Pages

संसद



संसद भारत का सर्वोच्‍च विधायी निकाय है। भारतीय संसद में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन-लोकसभा (लोगों का सदन) एवं राज्‍य सभा (राज्‍यों की परिषद) होते हैं। राष्‍ट्रपति के पास संसद के दोनों में से किसी भी सदन को बुलाने या स्‍थगित करने अथवा लोकसभा को भंग करने की शक्ति है। भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को प्रवृत्‍त हुआ। नए संविधान के तहत प्रथम आम चुनाव वर्ष 1951-52 में आयोजित किए गए थे तथा प्रथम निर्वाचित संसद अप्रैल, 1952 में अस्तित्‍व में आई, दूसरी लो‍कसभा अप्रैल, 1957 में, तीसरी लोकसभा अप्रैल 1962 में, चौथी लोक सभा मार्च 1967 में, पांचवीं लोकसभा मार्च 1971 में, छठी लोकसभा मार्च 1977 में, सातवीं लोकसभा जनवरी 1980 में, आठवीं लोकसभा दिसम्‍बर 1984 में, नौंवी लोकसभा दिसम्‍बर 1989 में, दसवीं लोकसभा जून 1991 में, ग्‍यारहवी लोकसभा मई 1996 में, बारहवीं लोकसभा मार्च 1998 में, तेरहवीं लोकसभा अक्‍तूबर 1999 में, चौदहवीं लोकसभा मई 2004 में तथा पन्द्रहवीं लोकसभा
अप्रैल 2009 में अस्तित्‍व में आई।

प्रकार दो व्यवस्थापक अंग युक्त सदन
राज्य सभा
लोक सभा
नेतृत्व
राज्य सभा के अध्यक्ष मोहम्मद हामिद अंसारी, स्वतंत्र
since 2007
बहुमत पार्टी नेता (राज्य सभा) प्रधान मंत्री
मनमोहन सिंह, (INC)
since 2007
लोक सभा
अध्यक्ष Meera Kumar, (CPM)
since 2009
Majority Leader (Lok Sabha) प्रणव मुखर्जी, (INC)
since 2004
सदस्य 802 (250 Rajya Sabha +
552 Lok Sabha)
सदन का स्थान
200px
Sansad Bhavan
Website
parliamentofindia.nic.in

लोकसभा और राज्‍यसभा के बीच अंतर

लोक सभा के सदस्‍यों को सीधे पात्र मतदाताओं द्वारा निर्वाचित किया जाता है। राज्‍य सभा के सदस्‍यों को एकल अंतरणीय मत के माध्‍यम से आनुपारित प्रतिनिधित्‍व की प्रणाली के अनुसार राज्‍य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्‍यों द्वारा चुना जाता है।
लोक सभा का सामान्‍य कार्यकाल केवल 5 वर्ष है जबकि राज्‍यसभा एक स्‍थायी निकाय है।
लोक सभा वह सदन है जिसके प्रति मंत्रिपरिषद सं‍विधान के अंतर्गत उत्‍तरदायी है। धन विधेयक को केवल लोकसभा में पुन: स्‍थापित किया जा सकता है। साथ ही, यह लोक सभा है जो देश के प्रशासन का संचालन करने के लिए धन प्रदान करती है।
राज्‍य सभा के पास यह घोषित करने के लिए विशेष शक्तियां है कि राष्‍ट्रीयहित में यह आवश्‍यक तथा समयोचित है कि संसद राज्‍य सूची में किसी मामले के संबंध में कानून बनाए अथवा कानून द्वारा एक या अधिक अखिल भारत सेवाओं का सृजन करे जो संघ तथा राज्‍यों के‍ लिए एक समान हो।

’शून्‍यकाल’ (जीरो आवर)

संसद के दोनों सदनों में प्रश्‍नकाल के ठीक बाद का समय आमतौर पर ‘शून्‍यकाल’ अथवा जीरो आवर के नाम से जाना जाने लगा है। यह एक से अधिक अर्थों में शून्‍यकाल होता है। 12 बजे दोपहर का समय न तो मध्‍याह्न पूर्व का समय होता है और न ही मध्‍याह्न पश्‍चात का समय। ‘शून्‍यकाल’ 12 बजे प्रारंभ होने के कारण इस नाम से जाना जाता है इसे ‘आवर’ भी कहा गया क्‍योंकि पहले ‘शून्‍यकाल’ पूरे घंटे तक चलताथा। अर्थात 1 बजे दिन में सदन का दिन के भोजन के लिए अवकाश होने तक।
यह कोई नहीं कह सकता कि इस काल के दौरान कौन-सा मामला उठ खड़ा हो या सरकार पर किस तरह का आक्रमण कर दिया जाए। नियमों में ‘शून्‍यकाल’ का कहीं भी कोई उल्‍लेख नहीं है। प्रश्‍नकाल के समाप्‍त होते ही सदस्‍यगण ऐसे मामले उठाने के लिए खड़े हो जाते हैं जिनके बारे में वे महसूस करते हैं कि कार्यवाही करने में देरी नहीं की जा सकती। हालांकि इस प्रकार मामले उठाने के लिए नियमों में कोई उपबंध नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रथा के पीछे यही विचार रहा है कि ऐसे नियम जो राष्‍ट्रीय महत्‍व के मामले या लोगों की गंभीर शिकायतों संबंधी मामले सदन में तुरंत उठाए जाने में सदस्‍यों के लिए बाधक होते हैं, वे निरर्थक हैं।
नियमों की दृष्‍टि से तथाकथित ‘शून्‍यकाल’ एक अनियमितता है। मामले चूंकि बिना अनुमति के या बिना पूर्व सूचना के उठाए जाते हैं अंतः इससे सदन का बहुमूल्‍य समय व्‍यर्थ जाता है। इससे सदन के विधायी, वित्तीय और अन्‍य नियमित कार्य का अतिक्रमण होता है। अब तो शून्‍यकाल में उठाये जाने वाले कुछ मामलों की पहले से दी गई सूचना के आधार पर, अध्‍यक्ष की अनुमति से, एक सूची भी बनने लगी है।

कार्य तथा शक्तियां

विधायिका के प्रमुख कार्यों में प्रशासन की देखरेख, बजट पारित करना, लोक शिकायतों की सुनवाई तथा विभिन्‍न विषयों यथा विकास योजनाओं, अंतर्राष्‍ट्रीय संबंध एवं राष्‍ट्रीय नीतियों पर चर्चा करना शामिल है। कतिपय परिस्थितियों में संसद अनन्‍य रूप से राज्‍यों के लिए आरक्षित इसकी परिधि के अंतर्गत आने वाले किसी विषय के संबंध में विधायी शक्ति को अभिग्रहीत कर सकती है। संसद में राष्‍ट्रपति पर महाभियोग चलाने, उच्‍चतम एवं उच्‍च न्‍यायालयों के न्‍यायाधीशों, मुख्‍य निर्वाचन आयुक्‍त तथा नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक को संविधान में निर्धारित प्रक्रिया विधि के अनुसार हटाने की शक्तियां भी विहित है। सभी विधानों के लिए संसद के दोनों सदनों की सहमति आवश्‍यक है। धन विधेयकों के मामले में, लोक सभा की इच्‍छा प्रवृत्‍त होगी। संविधान में संशोधन आरम्‍भ करने की शक्ति निहित है।

for more information
http://www.bharat.gov.in/govt/parliament.php
 —




For Daily GK Updates Like Facebook